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ICT कार्यशाला से जुड़ा अनुभव July 14, 2015

Filed under: Uncategorized — paintedpostcards @ 9:34 am

कोपासा द्वारा वडोदरा मे जुलाई २-४, २०१५ आयोजित ICT sharing and Documenting Workshop के माध्यम से Video Volunteers (VV) के कार्य को जानने का एक अवसर मिला. VV के प्रतिनिधियों ने अपने कार्य का व्याख्यान दिया एवं स्वास्थ्य से जुडी कुछ videos का प्रदर्शन किया. उसमे से यह जानकारी उभर कर आयी की VV अपने Community Correspondents के माध्यम से भारत के १८ राज्यों मैं कार्य कर रहे हैं. गुजरात मैं कार्यरत VV के Community Correspondent बिपिन सोलंकी ने अपना ११ साल का अनुभव साझा किया. बिपिन ने कहा की इस माध्यम से वे वंचित समुदाय के अधिकारों के हनन की बात को उजागर करते हैं. इस कार्यशाला में कोपासा से जुड़े ६ राज्यों के Community Practitioners ने ICT से जुड़े अनुभव साझा किये. इन अनुभवों से सामने आया की फोटोवौइस् के माध्यम से अधिकारों के हनन के लिए साक्ष्य का संचय किया जा सकता है एवं इसे पैरोकारी के लिए प्रयोग मैं लाया जा सकता है.

इस कार्यशाला मैं दो अलग माध्यम उभर कर आये, एक समुदाय आधारित निगरानी के लिए ICT का प्रयोग एवं दूसरा VV का अनुभव. इस कार्यशाला मैं फैसिलिटेटर के माध्यम से यह विचार भी साँझा हुआ की हमें community को romanticize नहीं करना है. समुदाय के सबसे निकट है Grassroots Practitioner, और CBM मे bottom up approach के लिए Grassroots Practitioner ही nodal point है.

मेरा पत्रकारिता का अनुभव है कि हम जब हम कोई मुद्दा/विषय लेते हैं,किसी स्टोरी या News के लिए,या तो वह need based होता है / need based in the sense that the topic is in currency or it depends upon the discretion of the editor, what topic needs to be done, or it is the prerogative of the journalist as to what s/he wants to chose depending upon her/his expertise or the grasp over the subject.

इन अनुभवों से कुछ विचार/प्रशन हैं- की VV के Videos के विषय का चयन समुदाय से चुने गए Community Correspondents कर रहे हैं, या समुदाय ने चिन्हित किया है, या वह स्क्रिप्टेड है/ एडिटर या अन्य द्वारा चुने गए हैं. क्योंकि VV का tie-up mainstream media के साथ भी है. Photovoice methodology के अनुसार समुदाय पर Focus है और समुदाय द्वारा ही मुद्दों का चयन किया जाता है.

दो अलग methodologies हैं, जिनसे अधिकारों के हनन का विषय उजागर हो रहा है, इनमे से कौन सी कारगर है यह मुद्दा नहीं है, कैसे दोनों का प्रयोग वंचित समुदाय के अधिकारों के लिए किया जा सकता है, और बेहतर तरीके से किया जा सकता है, यही देखना है, or whether the alignment of these two is possible?

सुरेखा!

 

Experiences about Gender training in Udaipur (Rajasthan) April 26, 2014

Filed under: Uncategorized — paintedpostcards @ 11:51 am

Seva Mandir has organized three days training with their organizational staff at Kaya training centre, Udaipur, Rajhasthan from 21st to 23rd April 2014. Total 32 staff (16 male and 16 female) of the organisation that were working at different level have participated.  The main objective of training was as –

  1. To develop understanding on gender & Sex and process of socialization process
  2. Perspective building on gender based discrimination & gender based violence
  3. To develop understanding on equity and equity
  4. To find out the different forms and issues on GBD & DBV, Power

I and Mr. V.K. Rai have facilitated the sessions around Gender, gender based discrimination and gender based violence, socialization process, root cause of GBD & GBV, privilege and restriction with men and women, understanding of power and power relation.

My experiences around this training

After a long time, I was involved in such training where men and women both were the participants. Around 11 participants had already taken the gender training and four of them work as trainers. According to Seva Mandir team, it was the first time that they had involved men as trainers on the issue of gender. Before starting the training process I had a lot of questions in my mind about balancing the participants. But after the process of day one, I found all the participants were interested to learn new things sincerely.

I feel that women participants were interested to know how after this training they would be successful in finding the support of men at the community level. Male participants had a lot of questions surrounding the new information of gender, the beginning of gender based discrimination, conflicts related to power dynamics and relationships between men and women. They were also raising questions related to patriarchal system and trying to show that men are also suffering from this condition.

It was a great opportunity for us; when participants could discuss together and tried to understand each other’s feeling and situations related to family and society level. I found that every participant was very serious and trying to support one another for understanding the current social, political, cultural situations that influence both men and women. I believe that men will start the positive change process from themselves and at family level on the principal of equity and equality and they will respect women’s equal human rights so that they can come into the mainstream and for this women will also support male staff in their change process at every level.

It is not a one- time process of behavioral change but it should be continuous and men should reflect about their experiences related to change, challenges, tension and problems in peer group. CHSJ will try to provide continuous support to carry forward this process in Rajasthan.

 

Mahendra Kumar

 

One day travel to Bhopal February 10, 2014

Filed under: Uncategorized — paintedpostcards @ 7:15 am

८ फरवरी, २०१४ को भोपाल में एक मीटिंग में भाग लेने का अवसर मिला l यह मीटिंग ‘फादर्स केयर’ के नाम से देश के चार राज्यों में चलाये जा रहे अभियान के अंतर्गत की गयी गतिविधियों की समीक्षा से सम्बन्धित थी l इस मीटिंग में केवल मध्य प्रदेश में साझीदार संस्थाओं ने भाग लिया व राज्य में वर्ष भर किये गये कार्यों व उसके परिणामों को प्रस्तुत किया l समीक्षा के दौरान पाया गया कि इस वर्ष यह  अभियान मध्य प्रदेश लगभग ४०० गावों तक पहुंचा, मुरैना व उसके आस-पास के क्षेत्र में २५ नये स्वयं सेवक अभियान से जुड़े, व भोपाल में स्थानीय समाचार पत्रों ने अभियान से सम्बन्धित कई समाचार प्रकाशित किये l राज्य में जहां-जहां भी अभियान चला वहां, विशेषकर किशोरियों में अपने प्रजनन स्वास्थ के प्रति बदलाव आ रहा है, अब वें प्रजनन स्वास्थ से जुड़े विषयों  पर अपने माता – पिता से बात करने लगी हैं

‘फादर्स केयर’ अभियान को और प्रभावी बनाने के लिए उपायों पर चर्चा हुई व आगामी वर्ष की गतिविधि योजना भी बनाई गयी l

रविश अहमद

 

पुरुषों के व्यवहार व प्रवृति में आ रहे बदलाव को अभी और आगे ले जाने की आवश्यकता है l

Filed under: Uncategorized — paintedpostcards @ 7:09 am

दिसम्बर, २०१३ में एक बार फिर से महाराष्ट्र जाने का अवसर मिला l इस बार की यात्रा सोलापुर जिले में रही, जहाँ समजदार जोरीदार परियोजना के दो विशेष कार्यक्रमों में भाग लिया l पहला कार्यक्रम था –ज़िला स्तर की ‘Dissemination Meeting Meeting’, जो दिनांक २६ दिसम्बर, २०१३ को सोलापुर (महाराष्ट्र) में सम्पन्न हुई l इस मीटिंग का आयोजन समजदार जोरीदार परियोजना की सहयोगी संस्थाओं ‘हालो मेडिकल फाउन्डेशन’ (सोलापुर) व ‘अस्तित्व ट्रस्ट’ (सांगोला) ने संयुक्त रूप से किया l  इस मीटिंग में सोलापुर ज़िले के उपायुक्त (नगर निगम),  अध्यक्ष (जिलापरिषद),  ज़िला स्वास्थ्य अधिकारी, राज्य संयोजक (यु. एन. एफ. पी. ऐ . , महाराष्ट्र), उप-निर्देशक  (सी. एच. एस. जे.), स्थानीय संवाददाता, परियोजना से जुड़े कर्मचारी (स्थानीय, राज्य एवं दिल्ली) व परियोजना से जुड़े एनिमेटरों ने अपने परिवार सहित भाग लिया l मीटिंग के दौरान, परियोजना के अंतर्गत किये गये पिछले चार सालों के कार्यो, नतीजो व प्रभावों की जानकारी दी गई, दो एनिमेटरों ने परिवार सहित अपने बदलाव की कहानी बताई व सभी विशिष्ट अतिथियों ने अपने – अपने विचार व्यक्त किये l अगले दिन कई स्थानीय समाचर पत्रो ने इस मीटिंग में हुई चर्चा व परियोजना के विषय में समाचार प्रकाशित किया l

दूसरी गतिविधि थी – दो दिवसीय सालाना अधिवेशन, जो २७-२८ दिसम्बर, २०१३ को पंडरपुर, ज़िला सोलापुर (महाराष्ट्र) में हुआ l मेरे अबतक के अनुभवों में यह एक अनोखा अधिवेशन था, जिसमे ग्रामीण स्तर के स्वयंसेवकों (एनिमेटरों ) व समूह के सदस्यों को बड़ी उत्साह के साथ भाग लेते देखा l इस अधिवेशन का आयोजन समजदार जोरीदार परियोजना की सहयोगी संस्थाओं ‘अस्तित्व ट्रस्ट’ (सांगोला) व सी. एच. एस. जे. ने संयुक्त रूप से किया l आयोजकों ने भी स्वयंसेवकों व समूह के सदस्यों के उत्साह को बनाये रखने के लिए सभी संभव प्रयास करे l रहने व खाने को व्यवस्था तो अच्छी थी ही, सभी लोगों का आपसी व्यवहार भी अच्छा था l सभी विशिष्ट अतिथियों ने अपने – अपने विचार व्यक्त किये तो अपने परिवार के साथ आये एनिमेटरों की पत्नियों ने  उनके जीवन में आये बदलाव की कहानी बताईl

अधिवेशन के दौरान कई सतर हुए जिनमे विशिष्ट अतिथियों के साथ-साथ स्वयंसेवकों व समूह के सदस्यों को भी अपने विचार व्यक्त करने का पूरा अवसर मिला l इसके लिए  विशिष्ट अतिथियों के व्याख्यान हुए तो स्वयंसेवकों व समूह के सदस्यों के विचार व्यक्त करने के लिए चित्र-कला व विषय आधारित समूह चर्चा का सहारा लिया गया l अधिवेशन में भाग ले रही स्वयंसेवकों की पत्नियों ने बदलाव की कहानी सुनाई l अधिवेशन के दौरान,  एक फिल्म ‘मैंस अगेंस्ट दा टाईड’ भी दिखाई गयी जिसमे समजदार जोरीदार परियोजना से जुड़े एक एनिमेटर के प्रयासों को भी दर्शाया गया है l दो दिन का  यह अधिवेशन इस विचार के साथ सम्पन्न हुआ कि पुरुषों के व्यवहार व प्रवृति में आ रहे बदलाव को अभी और आगे लेजाने की आवश्यकता है l  

 

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रविश अहमद

 

पारवती बाउल January 16, 2014

Filed under: Uncategorized — paintedpostcards @ 11:05 am

OBR के साथ जुड़ाव हमेशा ही कुछ नया रंग लाता है और जब इस बार बात हुई कि पारवती बाउल दिल्ली में हैं तो क्या उनका कोई प्रोग्राम करना चाहिए तो शायद मैने ही सबसे पहले हाँ कह दी । OBR कि कोर टीम होने के नाते हम 2 जनवरी को हो रहे इस कार्यक्रम के नियोजक भी थे । पर मैं 31st दिसंबर कि शाम तक दिल्ली में नहीं थी ।  कार्यक्रम का सारा नियोजन फोन पर ही चल रहा था । कुछ घबराहट भी हो रही थी क्योकि सन्देश एक से दूसरे फोन कॉल के बीच बदल भी रहे थे और बार बार बाकी टीमों के साथ बात करके स्पष्टता लेनी पड़ रही थी ।

नए साल का पहला दिन थोडा परेशानी वाला था । ऑफिस जाने  का मन नहीं था, 7 दिन महाराष्ट्र में बिताने के बाद, खासी थकान हो गयी थी । पर अभी भी कार्यक्रम कि आखरी प्लानिंग बाकी थी । लेकिन कार्यक्रम जो हुआ, उसने एक अलग ही दुनिया में पहुंचा दिया!

पारवती के बारे में पहली चीज़ जो दिमाग को छूती है वो यह कि पारवती एक सम्पूर्ण कलाकार है जो अपनी लीला / गायन में अपने आप को पूरी तरह  डाल देती है। एक हाथ से वो ढोल बजती हैं – ऐसा ढोल जो उनके कंधे से लटक कर कमर पर बंधा हुआ था । दूसरे हाथ से वो एकतारा बजा रही थीं । पैरों में मोटी पायल थी जो खन खन कर रही थी । वो ज़ोर से पर बहुत ही मधुर आवाज़ में गा रही थी और बीच में नृत्य करते हुए घूम रहीं थी । सब कुछ मिलाकर सुनने / देखने वाले को सम्मोहित कर रहा था । जब इस विचित्र दृश्य के सम्मोहन से आप बाहर आते हैं और उनके जटाधारी बालों के अलावा कुछ सोचने कि शक्ति रखते हैं तब ध्यान आता है कि वे जो गा रहीं हैं वह कितना सुन्दर है और कितना सार्थक भी है । सभी गीत बहुत अच्छे थे पर जो मुझे सबसे पसंद आया वह था – हे मन , तुम पुरुष हो या नारी?
2 जनवरी कि बहुत ही ठंडी शाम में, जब पारवती का गाना समाप्त हुआ तो वह पूरा पसीने में नहायी हुई थीं कि स्टेज से जा कर सीधे ही लेट गयीं । हम काफी देर तक खाली स्टेज को देख कर ही तालियां बजते रहे ।  यह एक ऐसा कार्यक्रम था जो मैं नहीं भूलूंगी।

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लावण्या मेहरा

 

Interesting Journey to Rajasthan January 15, 2014

Filed under: Uncategorized — paintedpostcards @ 12:39 pm

मंजरी संस्थान बूंदी जिला के नैनवा ब्लॉक में स्थित है, इसकी स्थापना स्वरुप जी के द्वारा informal way में बहुत पहले ही कर दी गयी थी लेकिन इसका formally रजिस्ट्रेशन ३० नवम्बर २००९ को राजस्थान सोसिटी एक्ट १९५८ के तहत स्वरुपजी के द्वारा करायी गयी! स्वरुप जी जो बहुत ही जिंदा दिल इंसान थे अब इस समय तो हमारे साथ नहीं रहे लेकिन उनकी वह मधुर यादें जो हमेशा हमारे साथ रहेगी इसी सिलसिले में CHSJ, Delhi के एक नए पहल को लेकर, में और सरिताजी उनकी संस्थान के लिए 6 जनवरी २०१४ को जन्स्ताब्दी एक्सप्रेस रेल गाड़ी से रवाना हुए! जब हमलोग (सरिताजी और दस्तगीर) रेलवे प्लेटफ़ॉर्म पर ट्रेन का इंतज़ार कर रहे थे तभी कुछ आवाजें जो हमलोगों की कानो में गूंजी वह बहुत ही अस्चार्यचाकित करने वाला था, जब हमें पता चला की जिस ट्रेन से हमलोगों को जाना था, अपने निर्धारित समय से ठीक ३ घंटे विलम्ब से चल रही है, सुना तो कुछ समय के लिए हमलोग परेशान हो गए लेकिन लम्बी इंतज़ार करने के अलावा हमारे पास कोई और दुसरा रास्ता नहीं था,ट्रेन आने के बाद हमलोग कोटा के लिए रवाना हो गए और तक़रीबन रात के ११ बजे हमलोग कोटा रेलवे स्टेशन पहुँच गए. बहुत पहले साथियों से हमने राजस्थान के ठण्ड के विषय में सुना ही था लेकिन इस समय महसूश करने को भी सौभाग्ग्य हमें प्राप्त हुआ!

होटल पहुँचने के पश्चयात खाना खा कर हम लोग सो गए! दुसरे दिन सुबह सवेरे हमलोगों नैनवा ब्लाक के लिए मंजरी के दो साथी के साथ  सुबह ८ बजे मंजरी मंजरी के ऑफिस के लिए रवाना हो गए. मंजरी संसथान पहुँचने के बाद वहां उपस्थित सभी साथियों के साथ एक छोटा सा परिचय किया गया और ऍन-जी-ओ असेसमेंट और फील्ड विजिट को लेकर एक चर्चा भी की गयी. इसके बाद हमलोग अपने-अपने काम में जुट गए. मैंने सरिताजी के सहयोग से मंजरी संसथान का NGO assessment किया और फिर कोरमा गाँव में किशोरी समुह के साथ बैठक के लिए रवाना हो गए. यह मेरे लिए सिखने का बहुत ही अच्छा अवसर था की किस प्रकार हम किसी भी संस्था के प्रतिनिधियों के साथ Advocacy कर  सकते हैं. इसके साथ हम लोगो ने मंजरी संसथान को युवा पुरुष किशोर लड़के प्रोजेक्ट का प्रस्तुतीकरण भी किया इसमें मुखत: हमने उन्हें बताया  की हमारा प्रोजेक्ट क्या है, इसका मुख्य उद्देश्य और लक्ष्य क्या है और हमें इस प्रोजेक्ट में किस प्रकार की गतिविधि कब और कैसे और कहाँ करनी है, इसमें chsjमंजरी और CHSJ की क्या भूमिका होगी.

फील्ड विजिट के लिए हमलोगों कोरमा गाँव गए.  कोरमा गाँव हमारे किशोर और युवा प्रोजेक्ट के लिए भी चुना गया है यहाँ हमलोगों ने मंजरी संसथान के कार्यो को बड़े नजदीक से जानने और देखने को मौका मिला. जो हमारे लिए बहुत ही अच्छा  रहा, जैसे उनके कार्यकर्ता को लोग उनके नाम से नहीं बल्कि उनके संस्था के नाम से जानते हैं, बिना पैसे का उनका जो काम में सजगता दिखा, यह काबिले तारीफ है, उनका किशोर लडकियों के साथ का काम हो या गाँव की महिलाओ के साथ अन्य मुद्दे पर बात हो सभी चीजों में उनकी पहल और उनकी बिना पैसे के इन कामो को आगे बढाने और करने के लिए जूझना यह आज बहुत ही कम देखने को मिलता है! बजरंगजी और संतोषजी मंजरी संस्थान के यह दो अकेले सिपाही है, जिन्होंने अपनी किशोर और युवा लड़के के प्रोजेक्ट (फोर्ड फाउंडेशन) के पहल में उन सभी १५ गाँव का PRA or social mapping  कर चुके हैं उन्होंने PRA मैपिंग के दौरान किस घर में कितने लोग और कितने युवा रहते हैं, किस घर में आँगन बाड़ी के द्वारा लाभ मिलता है,  इसकी भी पहचान की है, मंजरी  संस्था के काम को देख कर ऐसा लगता है की इनके इरादे इतने मजबूत है की मुद्दे इनके लिए मायने रखते हैं न की पैसे. संस्था में कोई पैसा नहीं होने के बाद भी दोनों साथियों का अपने काम के प्रति लगाव और उनकी संकलप बहुत ही मजबूत हे, इनका आँगन बाड़ी कार्यकर्ता और आशा कार्यकर्ता के साथ भी बहुत अच्छा सम्बन्ध और नेटवर्किंग है इनके कार्य को और निखार देता है!

फील्ड विजिट के दौरान बैठक और ऍन-जी-ओ अस्सेस्मेंट के कार्य को खत्म करने के बाद हमलोग मंजरी संस्था के लिए रवाना हुए और वहां स्वरुपजी के घर को भी देखा जहाँ वह रहा करते थे, शाम बहुत होने के कारन हम लोग वापस कोटा के लिए रवाना हो गए. सफ़र काफी अच्छा था शिवजी और बजरंगजी ने हमें सफ़र की दुरी को अपने बातो से पता नहीं चलने दिया.

इस सफ़र की कुछ अच्छी और कुछ न भूलने वाली यादें भी हमारे साथ थी, जैसे हमारा कोटा से उदयपुर जाने वाली रेल गाड़ी पिछली रात ही उदयपुर से जा चुकी थी और बहुत प्रयास के बावजूद हमें उदयपुर जाने के लिए कोई और दुसरा साधन भी नहीं मिला, अन्तः हमलोगों ने बस से उदयपुर जाने का फैसला किया लेकिन कुछ भी हमारे हाँथ नहीं आया और हमें १ दिन और कोटा की ठंडी देखने का मौका मिला, यह मेरे जीवन का पहला अवसर था की मैंने इस तरह की घटनायो का सामना किया, एक टिकट एजेंट की गलती की वजह से हम दोनों लोग को कोटा से ही डेल्ही वापस आना पड़ा, डेल्ही आने के लिए भी हमारे पास कोई टिकट नहीं था जो टिकट था वह भी उदयपुर से डेल्ही की ट्रेन की थी, मै और सरिताजी काफी परेशान थे, एक तरफ टिकेट का इन्तेजाम हमारे संस्था के सहयोगी लेट नाईट तक ऑफिस से कर रहे थे और एक तरफ में और मंजरी के साथी कोटा रेलवे स्टेशन का चक्कर काट रहा था ताकि हमारी उदयपुर से जो डेल्ही की टिकट है उसमे ही हमें बोर्डिंग कोटा से मिल जाये इसके लिए हम मंजरी के साथियों के साथ स्टेशन मास्टर से जाकर मुलाकात की उन्होंने कहा की हो जायेगा परन्तु आरक्षण काउंटर बंद होने में सिर्फ ५ मिनट बचे हैं आप जल्द रिजर्वेशन काउंटर पर जायें और एक आवेदन पत्र लिखकर वहां सबमिट करें हमलोग भाग कर रिजर्वेशन काउंटर पहुंचे और आवेदन पत्र लिखा लेकिन समय ख़तम हो जाने के कारण वह संलग्न नहीं हो पाया और हमलोग वापस होटल लौट गए इसके साथ ही हमारा डेल्ही जल्द लौटने का प्रयास कहें या सपना यह वहीँ ख़तम हो गया और अन्तः रात्रि के ९:५० में ऑफिस के साथी तुलसी का फ़ोन आया की आपलोगो के लिए ९ तारीख का टिकट मिल रहा है क्या करना है , मैंने उनसे ५ मिनट माँगा और खुद चेक करने के बाद उन्हें टिकट करवाने को कहा.

९ जनवरी २०१४ को हमलोग ने डेल्ही की ट्रेन लेकर डेल्ही शाम करीब ७ बजे वापस आ गए,  लेकिन यह मेरे जीवन की ऐसी पहली घटना है जो शायद में कभी नहीं भूल पाउँगा. मैंने इन गलतियों से कई नई सबक ली है जो आने वाले समय में ऐसी कोई गलती न हो इसे अपने जेहन में जरुर रखूँगा.

by Dastagir Ali AzamImageImageImage

 

सीधी पर्सिली रिट्रीट का सफ़र November 19, 2013

Filed under: Uncategorized — paintedpostcards @ 8:59 am
हमारी रिट्रीट कि प्लांनिग  होते होते बहुत वक्त हो गया था, कुछ ना कुछ  काम आ ही जाता था, और फिर प्लानिंग , प्लानिंग ही रह जाती थी ! अब हम लोग इसे  एक ऐसा सपना मान कर  देख रहे थे कि यह भविष्य मैं जरुर होगा ! वैसे तो तीन स्टाफ को छोड़कर बाकि सभ ही स्टाफ पुराने ही है लेकिन ये सब सिर्फ प्लानिंग के ही हिसेसधार है!
चलो देर ही सही सावेरा तो हुवा प्लानिंग अब सच्चाई मैं बदल गई, लेकिन अपनी परम्परगत तरीके से….
पहले कि रिट्रीट कि तरह एस रिट्रीट का भी अपना ही अनुभव है, जैसे हमे ट्रैन के लिए दो बजे निकलना था, लेकिन हम चार बजे निकले, हमे वंहा ग्यारा बजे तक पहुचना था, लेकिन सात बजे पहुचे !
सफ़र लम्बा था, लेकिन उसमे भी अलग मज़ा था, जैसे ट्रैन मैं हमारी सीट्स अपडेट हो गई हमे  2  AC कि सीट्स मिल गई , पहले  हुमने अड्वोकस्य कि पर लाभ नहीं हुवा, क्योंकि जो यात्री वंहा पर बेठे  थे, वे अलग -अलग जगह पर उतरने वाले थे , तो हमे अपनी सीट पर ही बैठना पड़ा ! लेकिन हम भी कंहा  माने वाले थे, रात को हमने बहुत  देर तक गाने गाते गए, फोटोग्राफ खिचे, और शुभी के साथ मस्ती भी कि !
सीधी पहुच कर हम सब का येही प्लान  था ,कि पहले चाय काफी पी जाए, फिर आगे  का प्लान किया जाए! सीधी  से पर्सिली का रास्ता लगभग 5 से 6 घंटे का था ! सफ़र लम्बा था लेकिन सफ़र मैं जो खेत- खलियान, जंगल, नदी -नाले आ रहे थे, उससे सफ़र लम्बा नहीं लग रहा था ! साथ ही साथ बीच- बीच मैं ढाबे पर  रुक कर चाय कॉफी पीने का भी अलग  ही मजा था !
वंहा पहच कर रास्ते कि थकन  तो उतरी ही साथ ही साथ एक नया अनुभव भी हुवा, वंहा पर जंहा पर हम ठहरे थे ,वंहा पर एक नदी थी और जंगल भी , पहुच कर बहुत अच्छा लगा !  एक ही रूम मैं हम 6 महिलाओ के सात एक पुरुष अथात शुभी था ! रात  को देर तक बाते करना, सरिता जी का बिलकुल मासूमियत कि तरह  हर चीज़ का जवाब देना, शुभी  का अनीता को नहीं छोड़ना , बहुत अलग मजा था , रात  को कब सोए कब उढे कुछ पता ही नहीं चला ! वंहा हम सुबह नदी की  सेर पर गए, मस्ती कि और फ़ोटो भी खिचवाई !
अभिजीत सर , सतीश जी, सरिता जी और प्रेमदास जी ने सेशन बहुत अच्छे  से तय किये थे, कि हम वंहा कुछ सीखे भी व साथ ही सच्चाई को देखे भी और साथ ही साथ खुले वातावरण का लुत्फ़ भी उठाए ! हम लोग फील्ड विजिट पर भी गए जंहा हमने वह Animator  के साथ साथ वंहा के लोगो और किशोरियो से भी बात  कि , वंहा  के लोगो मैं जागरुकता कि किरण के सात उनके अतिथि सत्कार से मुझे  बहुत आच्छा लगा |
वंहा पर सांस्कृतिक कार्यकर्म का भी आयोजन किया गया था, जिसमे सभी ने नृत्य  किया, और साथ  ही साथ वंहा के लोगो ने अपना पारम्परिक नृत्य दिखाया,  जो सबसे भिन्न था, क्योंकि उस नृत्य मैं उन्होंने ने अपनी  पम्परा को दिखाया था , जिसमे वो अनुरोध कर रहे थे जंगल को न काटने का , और जैसे जैसे वह एक चरण से दूसरे चरण मैं जा रहे थे,  उनकी नृत्य करने  कि ऊर्जा बदती  जा रही थी ! रात का खाना भी वही पर था, जो बिलकुल पारम्परिक था, पत्तल मैं खाना, दोनों मैं दाल, सब्जी , खीर , बस खा कर मजा ही आ गया !
बताने को तो बहुत कुछ है पर क्या -२ बताए और क्या छोड़ो नहीं समझ आ रहा है , क्योंकि वंहा का हर एक पल बहुत सुन्दर था  !
पर्सिली मैं ये सारा कार्यकर्म का चुनाव  अभिजीत सर का  था , और  उसको वंहा पर आयोजित सतीश जी, महेंद्र और ग्राम सुधार कि टीम ने किया , जिसके लिए हम सभी आभारी है !
by Tulsi Manimutthu