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पारवती बाउल January 16, 2014

Filed under: Uncategorized — paintedpostcards @ 11:05 am

OBR के साथ जुड़ाव हमेशा ही कुछ नया रंग लाता है और जब इस बार बात हुई कि पारवती बाउल दिल्ली में हैं तो क्या उनका कोई प्रोग्राम करना चाहिए तो शायद मैने ही सबसे पहले हाँ कह दी । OBR कि कोर टीम होने के नाते हम 2 जनवरी को हो रहे इस कार्यक्रम के नियोजक भी थे । पर मैं 31st दिसंबर कि शाम तक दिल्ली में नहीं थी ।  कार्यक्रम का सारा नियोजन फोन पर ही चल रहा था । कुछ घबराहट भी हो रही थी क्योकि सन्देश एक से दूसरे फोन कॉल के बीच बदल भी रहे थे और बार बार बाकी टीमों के साथ बात करके स्पष्टता लेनी पड़ रही थी ।

नए साल का पहला दिन थोडा परेशानी वाला था । ऑफिस जाने  का मन नहीं था, 7 दिन महाराष्ट्र में बिताने के बाद, खासी थकान हो गयी थी । पर अभी भी कार्यक्रम कि आखरी प्लानिंग बाकी थी । लेकिन कार्यक्रम जो हुआ, उसने एक अलग ही दुनिया में पहुंचा दिया!

पारवती के बारे में पहली चीज़ जो दिमाग को छूती है वो यह कि पारवती एक सम्पूर्ण कलाकार है जो अपनी लीला / गायन में अपने आप को पूरी तरह  डाल देती है। एक हाथ से वो ढोल बजती हैं – ऐसा ढोल जो उनके कंधे से लटक कर कमर पर बंधा हुआ था । दूसरे हाथ से वो एकतारा बजा रही थीं । पैरों में मोटी पायल थी जो खन खन कर रही थी । वो ज़ोर से पर बहुत ही मधुर आवाज़ में गा रही थी और बीच में नृत्य करते हुए घूम रहीं थी । सब कुछ मिलाकर सुनने / देखने वाले को सम्मोहित कर रहा था । जब इस विचित्र दृश्य के सम्मोहन से आप बाहर आते हैं और उनके जटाधारी बालों के अलावा कुछ सोचने कि शक्ति रखते हैं तब ध्यान आता है कि वे जो गा रहीं हैं वह कितना सुन्दर है और कितना सार्थक भी है । सभी गीत बहुत अच्छे थे पर जो मुझे सबसे पसंद आया वह था – हे मन , तुम पुरुष हो या नारी?
2 जनवरी कि बहुत ही ठंडी शाम में, जब पारवती का गाना समाप्त हुआ तो वह पूरा पसीने में नहायी हुई थीं कि स्टेज से जा कर सीधे ही लेट गयीं । हम काफी देर तक खाली स्टेज को देख कर ही तालियां बजते रहे ।  यह एक ऐसा कार्यक्रम था जो मैं नहीं भूलूंगी।

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लावण्या मेहरा

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One Response to “पारवती बाउल”

  1. Dastagir Ali Azam Says:

    Really it was an unforgettable moment and as u capture the whole moment in a very small paragraph is very beautiful..


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