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मेरा पहला री–ट्रीट November 8, 2013

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मुझे हाल ही में अपनी संस्था, सी . एच . एस . जे . दिल्ली, कि ओर से री-ट्रीट में भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ l मैने सह- परिवार, पत्नी और ढाई साल की पुत्री के साथ इस री- ट्रीट में भाग लिया l यह मेरे जीवन का पहला री- ट्रीट था l इस लिए इसके प्रति में बहुत उत्साहित था, यह उत्साह मेरे  परिवार में भी उतना ही था l यह री-ट्रीट 4-6 अक्टूबर 2013, को तीन दिन का था जो सीधी (मध्य प्रदेश) के पास परसली में हुआ l रहने-खाने की व्यवस्था, सीधी में सी.एच.एस.जे. के साथ काम कर रही सन्स्था “ग्रामीण सुधार समिति” ने किया l रहने कि व्यवस्था  परसली के वन विभाग के गेस्ट हाऊस में की गयी, जो वास्तव में सराहनिये थी l दिल्ली जैसे भीड़-भाड़ वाले शहर में रहने वाले हम लोगो के लिए तो ये एक सपने जैसा ही था – सब कुछ हरा-भरा, गेस्ट हाऊस के पीछे बहती हुयीं नहर, पंछियों की मधुर आवाजें, गेस्ट हाऊस में साफ़-सुथरी व्यवस्था, सह-कर्मियों की अठखेलिया और ऐसे में मेरे परिवार का मेरे साथ होना – यह सब मन – मस्तिष्क को आनंदित कर रहा था l

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इस री-ट्रीट के दो पहलु थे, एक तो अपने कम के विषय में और सीखना और दूसरा मौज-मस्ती l री-ट्रीट के लिए की गयी यात्रा थका देने वाली थी, मगर री-ट्रीट ने सिखाया भी बहुत l ऐसा सुन्दर वातावरण एक लम्बे समय के बाद देखने को मिला l अलग – अलग समय पर सेशंस हुए जिनके माध्यम से  ग्रामीण और आदिवासियो की जीवन शैली व जाने-अनजाने में उनके साथ होने वाले अन्याय के विषय में बहुत कुछ जानने को मिला l

बड़े आश्चर्य की बात है कि विकास के नाम पर जो शहरी व मशीनीकरण हो रहा है उसके चलते ग्रामीणो व आदिवासियो के जीवन पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है, जिससे हम हमेशा अनजान ही रहते है l  हज़ारो ग्रामीण / आदिवासी विकास के नाम पर अपने घर, ज़मीन, संपदा, संस्कृति, पहचान यानि अपना अस्तितिव खो देते है l  शहरीकरण व मशीनीकरण इन अबोधों के लिए एक आपदा की तरह है, जो शुरू में लक्ष्मी के रूप में आती है और  बाद में काल-भैरवी का रूप धारण कर लेती है l इसके लिए कही कोई सुनवाई नहीं है l इसके विरुद्ध होने वाले विरोध प्रदर्शन को भी अपराध की दृष्टि के देखा जाता है l

सीखने – सिखाने के क्रम में सीधी के एक आदिवासी गांव में भी जाना हुआ l गांव तक पहुचना ही अपने आप में एक चुनौती थी l  हमारे पास कार थी फिर भी गांव तक पहुचने में कठिनाई हुयी – न रास्ता था न सड़क l  गांव में पहुच कर हमने युवा पुरुषो के समूह के बात-चीत की l  हमारी कुछ महिला सदस्यों ने गांव की कुछ महिलओ से अलग में बात – चीत की, इसके लिए उन्हें एक पहाड़ी को पैदल पर कर के गांव के दूसरे भाग में जाना पड़ा l

बात – चीत के दौरान लोगों ने बताया कि तीन साल पहले गांव से बाहर जाने-आने  के लिए पक्का रास्ता नही था, अब सड़क बन गयी है l  मगर हमें तो कहीं कोई पक्की सड़क (शहरों की तरह ) नज़र नहीं आयी l इस गावं के सबसे नज़दीक स्वस्थ्य सेवा, वो भी प्राथमिक ढाई किलो मीटर दूर है l मेरी सबसे बड़ी चिंता ये थी कि गावं के लोग जिनमें महिलाये, गर्भवती व बच्चे विशेष है, आपात स्थिति में स्वस्थ्य सेवाओं तक कैसे पहुंचते है ? गावं के लोगों ने बताया कि फ़ोन करके ‘एम्बुलेन्स’ बुलाते हैं l मगर मै जब तक गावं में रहा, मेरे मोबाइल में नेटवर्क ही नही था l

गावं के लोगों ने अपनी लोक-कला का प्रदर्शन संगीत व नृत्य के माध्यम से किया l एक के बाद एक कई लोक-गीत अपनी स्थानिये भाषा में गाये व साथ – साथ समूह में नृत्य करते रहे – थके नही l हमने भी जम कर तालियां बजायीं l अँधेरा बढ़ने लगा तो हम गावं से वापस लौटे l

अगले दिन सभी सहकर्मी जो छोटे – छोटे दलों में अलग – अलग गावों में गये थे, सभी ने अपने अनुभव व्यक्त किये l हमारे एक सहकर्मी जो एक लम्बे समय से मध्य प्रदेश में कार्यरत हैं, ने कहा कि ये आदिवासी पर्यावरण प्रेमी होते हैं l पर्यावरण के प्रति आदिवासियों का यह प्रेम उनके रहन – सहन, खान-पान, नृत्ये व संगीत में साफ़ – साफ़ नज़र आता हैं l पर्यावरण से छेड़-छाड़ का मतलब हैं इन आदिवासियों के जीवन से छेड़-छाड़ l मेरे सह-कर्मी की ये बात, पता नहीं क्यों मेरे मन में घर कर गयी l यह बात मेरे लिए इस री-ट्रीट कि सबसे बड़ी सीख थी l

सीखने – सिखाने के साथ – साथ घूमना – फिरना भी हुआ l सब लोग ‘काट का बंगला’ देखने गये l वहाँ का द्र्श्य और भी मोहक था l  नहर के किनारे हरे – भरे जंगल में लकड़ी का बना एक ऐतिहासिक बंगला l सभी सहकर्मियों ने यहाँ बड़े उत्साह के साथ खूब फ़ोटो खींचे l  परसली से वापस सतना आते समय ‘बाण सागर बांध’ पर भी घूमने गये, यहाँ का नज़ारा अलग ही था l  बांध पर घूमते समय पता चला कि इस बांध से रोके गये पानी के भराव में लगभग १२५ गावं जल-गमन हो गये l री-ट्रीट के तीसरे दिन वापस दिल्ली की दिशा ली l  परसली से सतना व् सतना से दिल्ली – एक लम्बी यात्रा कर वापस फिर उसी शोर-शराबे व भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी में वापस लौट आये l

रविश अहमद, प्रोग्राम ऑफिसर, सी . एच . एस . जे . दिल्ली.

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