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कुछ दिन परसल्ली में और पसरते, साझा विचारों से खूब निखरते ! October 23, 2013

Filed under: Uncategorized — paintedpostcards @ 8:13 am

J Blog1 J Blog2 J Blog3परसली-प्रकृति की छटा बिखेरे व मनोहारी दृश्यों के बीच बसा है। जहां तेंदुआ, साल, महुआ, पलाश व अन्य चौड़ी पत्तीयों के घने जंगल हैं। वहां की शुद्ध हवा, हरे भरे जंगल, कल-कल करती नदी का मन्दम मन्दम शोर सभी  का मन मोह लेती है। नदी किनारे बना प्र्याटक आवास गृह ऐसा लगता है। कि सफेद चादर ओढे जमीन पर चॉद निकल आया हो। और हम सभी से कह रहा हो कि मैं सिर्फ रहने की सुविधा ही नहीं देता हुॅ। बल्कि में रात्रि में रोनाी का काम भी करता हुॅ जिसे आपके हारों में मून लाईट कहा जाता है। मध्य रात्रि 8-9 बजे दिं0 04.10.13 को अचानक कुछ गाड़़ीयों की आवाज के साथ बहुत से लोगों का शोर उस सून सान जगह को व्याकुल करता सा प्रतीत होता है। और सारे पेड़ाें की पत्तीयां आपस में खूसर फुसर करने लगती हैं। कि इतने सारे लोग और कमरे  सिर्फ 04 बहुत कम जगह है। अब क्या होगा? तभी सारे लोग प्रकृति प्रेममयी नजरों से उस सान्त, मनमोहक प्र्याटक आवास गृह को देखने लगते हैं। कुछ साथी बिजली के मन्दम रोनाी में बाहर के दृय भी देखने लगते हैं, कुछ साथीयों को उस प्र्याटक आवास गृह के डिजायन ने अपनी ओर खींच लिया।  कुछ साथीयों को बहती नदी के संगीतमय कल-कल करती आवाज ने अपनी ओर खींच लिया। तभी मुझे लगा कि इस प्राकृतिक छटा ने सभी को आधुनिक सुख सुविधाओं से दूर भूलाकर अपने अनुपम प्राकृतिक सौन्र्दय के मोहपाा में बांध लिया है।
मेरे लिए यह पहला अनुभव था कि मैं सी0एच0एस0जे0 टीम के साथ तीन दिन लगातार रूकने वाला हुॅ। मेरे मन में कई तरह के सवाल पैदा होते थे। कि क्या मैं इन लोगों के सामने अपनी बातों को रख पाउॅगा यां नहीं। इनकी भाषा में भारी भरकम अंग्रेजी होगी जिसे मैं समझ पाउॅगा यां नहीं। इस तरह के कई सवाल थे। जिससे में उलझन में था। मुझे सतना से सुबह ही निकलना था। हम लोग एक गाड़ी में परसली के लिए निकल पड़े। परसली पहुॅचते ही वहां की मनोरम छटा देख कर मुझे अपना गॉव अपने जंगल याद आने लगे। दिन में हम लोगों ने खिचड़ी बनवायी। और बाहर देखा बाहर  हल्की बूॅदा बॉदी हो रही है। जब बारिश बन्द हुई तब हम लोग बाहर घ्ुमाने निकल पड़े। घुमते हुऐ खूब ढेरों बातें हुई। जिसमें मेंने बताया कि भालू से अपनी रक्षा कैसे की जाती है। तब केदार जी ने बताया कि बताओ कैसे रक्षा की जाती है। मेंने कहा जब भालू पीछे पड़े तो भागना नहीं चाहिए। किसी पेड़ की आड़ में रूक जाओ और जब भालू आपको पकड़ने के लिए आये तो आप पेड़ की आड़ ले लो भालू आपको पकड़ने के लिए पेड़ को पकड़ेगा। तो उसके दोनों हाथों को पेड़ से रगड़ दो भालू मर जायेगा। केदार जी ने कहा अभी भालू दिखायी देगा। आप हमें प्रकटिकल करके दिखाओ तो तब मानंगे। फिर मेरी खूब मजाक बनायी।  और फिर केदार जी ने कई गॉवों की कहानीयां भी सुनाई। और कहा भालू से बचाव का एक ही तरीका है। भालू के गर्जन के से पहले खूब शोर करना चाहिए जिससे भालू भाग जाता है।
जब प्र्याटक आवास गृह में वापस आये तो वहां के चौकीदार पंडित जी को मेंने भूतों की कहानीयां सुनाई उनमें मेंने एक कहानी एैसी सुनायी जो जेण्डर धारणा से जुी थी। पंडित जी खुश हो गये। फिर मेंने पंडितों की चालाकी पर एक कहानी सुनाई तो पंडित जी थोडा उखड़ने लगे। ये सब मजाकों का दौर चल रहा था। खैर पंडित जी को मना लिया।
लेकिन जो मन का डर था बना रहा। रात को सारी टीम बैठी और चर्चा की गयी कि हम यहां पर क्या चर्चा करने वाले हैं। अगले दिन का प्लान क्या हैं सारी बातें हुई। इस चर्चा में एक खाा बात यह थी कि ऐसा लग रहा था कि लोग थके होने के बाद भी बड़े जोश व उत्साह से बात कर रहे हैं। धीरे धीरे बड़ा खुनाुमा माहौल बनने लग। मेरा थोड़ा आत्मविवास बनते जा रहा था और मैं लोगों के बीच घुलने मिलने लगा। जो अगेंजी भाषा का खौप मेरे दिमाग में था वह निकलने लगा। रात को खाना खाकर हसीं मजाक व गीत गाते हुऐ सो गये।
सुबह चाय नाता के बाद सारी टीम पुन: बैठी और चर्चा का दौर ाुरू हुआ। मुख्तह: तीन मुद्दों पर चर्चा करायी गयी। इस चर्चा में मेरी कई सारी भ्रान्तियां दूर हुई। और नयी सीख बनी।

•   आधुनिक विकास
•    वंचित समुदाय
•    जेण्डर न्याय
उपर्रोत  मुद्दों पर खूब चर्चा के बाद साझी समझ बनी। सबसे बडी ख़ुशी इस बात पर थी। कि संस्था रिट्रीट के समय पर जहां कार्यकत्र्ता ये मानते हैं। कि कोई भाषण बाजी नहीं होगी सब मस्ती से रहंगे। लेकिन संस्था इस मस्ती भरे माहौल में भी उस वंचित सूदाय के बारे में चिन्तनशील रहती है। वंचितों के मुद्दों पर सवेदनशीलता बनाये रखना ये सब जिस संस्था का मूल्य हो। ये मेरी समझ बनी। यह दिन मेरे लिए उर्जावान दिन के रूप् में हमेशा याद रहेगा।
दिनांक 5.9.2013 का दिन गॉव भ्रमण का रहा। जिसमें साझेदार परियोजना के काम को समुदाय के स्तर पर जानने का एक बेहत्राीन मौका रहा। हम लोग गॉव भ्रमण में टीम के रूप् में बटे थे। हमारी टीम में दादा हमारे साथ थे। गॉव जाते समय उन्होने हमें समूह चर्चा  के लिए एक खाका समझाया। उसी पर बात करने के लिए कहा था। लेकिन गॉव से लौटते वक्त कोई बात नहीं हो पायी। सायद उनकी फीडबैक मिलती तो आगे और हमारी जानकारी बढती। रात्रि में घोरदण्ड सीधी गये। जो कि ऐतिहासिक जानकारी में भी दण्ड देने की जगह के नाम से महाूर है। लेकिन टीम व गॉव के लोगों ने मिलकर उस रात्रि को नाच गानों से आन्नदित कर दिया। खाकार आदिवासी शैला नृत्य ने सबका मन मोह लिया। टीम में कुछ लोगों को छोड़ कर सबने डांस में भागीदारी की। जिन्होंने डांस नहीं किया वो नाम मुझे याद हैं। लेकिन अभी नहीं वक्त आने पर- रिट्रीट

जगदीश लाल

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