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सीधी से कभी मन नहीं भरेगा ! October 15, 2013

Filed under: Uncategorized — paintedpostcards @ 4:35 am

सीधी जाने का मन बहुत था । सीधी ऐसी जगह है जिसके बारे में सोच कर ही दिल में ख़ुशी सी होती है. हरे भरे जंगल, पहाड़, संकरे रास्ते, जीप में डोलते हुए सवारी करना और दूर दूर तक कम आबादी- यह सब मुझे बहुत पसंद है । मैं उन लोगों से भी मिलना चाहती थी जिनसे पिछले साल सीधी में जान पहचान हुई थी- उर्मिला जी और उदय भान जी ।
सीधी में बहुत कुछ मिला- छोटी सी दुकानों में ग़जब चाय , समोसे के साथ उनकी ख़ास खट्टाई , गोविन्दगढ़ का वह ढाबा  जहाँ बस बारिश होने ही वाली थी, बसंत राज सिंह के घर वड़ा और छांछ , त्यागी जी के शब्दों में उनके संघर्ष की यात्रा, काठ बंगला, सोन नदी पर बना बाण सागर बाँध , और पूरे समय यात्रा में अन्ताक्षरी खेलना!
एक याद अभी भी चेहरे पर मुस्कान ले आती है । यात्रा से हमें पर्सिली लगभग सुबह दस बजे तक पहुँच जाना चाहिए था । परंपरागत तौर से हम जाकर पहुंचे ठीक दस घंटे देर से- रात आठ बजे । अगर यात्रा की थकान थी भी तो उसे सीधी के नजारों ने मिटा दी थी । सेशन और रात का खाना होने के बाद जब आखिर सोने की बारी आई तब नींद आ नहीं रही थी और सीधी आकर कमरे में बंद होकर सोने का मन भी नहीं कर रहा था । विश्राम घर में कमरे केवल चार थे तो कुछ पुरुष साथियों ने नीचे हॉल में गद्दा लगा लिया था । श्रीति, मैं और पूनम भी वहीँ पहुँच गए । एक बढ़िया सी जगह मिल गयी और वही तीन गद्दे  डाल  दिए और चद्दर लपेट कर सोने का प्रयास करने लगे । गद्दे अजीब थे, रुई बीच बीच में इकठ्ठा हो गयी थी तो लग रहा था की गद्दों में कंचे डाले हुए हैं । अब नींद नहीं आ रही थी । बहुत कुछ था आपस में बात करने के लिए। लगभग एक- डेढ़ घंटे तक अँधेरे में लेटे लेटे  हम लोग धीरे धीरे बात करते हुए हंस रहे थे । इतनी देर तक और इतनी जोर से  हसने का नतीजा यह हुआ की पुरुष भी उठ गये ।  उन्हे लगा की हसने में तो हरा नहीं सकते तो इन तीन कववो जैसी आवाज वाली लड़कियों को गाने में ही पछाड देते  हैं । उनका अनुमान सही था । उस तरफ  एक से एक बढ़कर  गाने वाले थे तो रात के एक डेढ़ बजे से अलग अलग प्रदेशों के गीत चले ।  कभी केदार जी, कभी त्यागी जी, कभी जगदीश जी, कभी अजय भी । बस मन कर रहा था की रात ऐसे ही बीत जाये – कुछ हसी में और कुछ गानों में । फिर दो बजे तक सब शांत होने लगे तो अब लड़कियों ने विचार किया की या तो सो ही जायें या नदी तक चलते हैं । नदी का प्लान बन रहा था की एक बड़ा सा जानवर हमें कांच के दरवाज़े के बाहर दिखा । होना तो कुत्ता ही थी पर आंखे एक टुक कर के देख रहा था तो हमें लगा की कुछ और न हो- जैसे सिआर। इतनी में श्रीति चिल्लाई की सिआर है- लेकिन घबराहट में उसके मुह से सिआर के बजाये निकला – सियर , सियर ! इसपर हमें और हसी आ गयि । डर भी था पर हंसने से फुर्सत भी नहीं थी ।  वह जो भी था थोड़ी देर में हमसे ऊब कर वहीँ लेट कर सो गया । हमने भी दोबारा सोने का प्रयास किया । अब तो पूरे हॉल में हम ही तीन जागे हुए थे । फिर आंखे बंद हुई और जैसे ही नींद आने लगी- पूनम चिल्ला उठी । उफ़ अब क्या ?।  पूनम ने बताया की चूहा है । हमने कहा की ज़रूर होगा पर अब चला गया तो अब सो जाओ ।  पूनम ने कहा की नहीं, बात यह है की चूहा उसकी बाजू पर “किस” कर के गया है !  एक तो वैसे ही चौबीस घंटे से ज्यादा यात्रा कर के आये थे, ढंग से सोये भी नहीं थे, नयी जगह भी थी, थके हुए भी थे, अन्ताक्षरी गा गा  के गला पक  गया था, मछर काट रहे थे, ओडोमोस की सुगंध से सर भारी हो रहा था– ऊपर से पूनम का यह दावा की चूहा उसे “किस” कर के गया है । अब यह तो ज्यादा हो रहा था । तीन चार मिनट तो सोचने में लग गए की हँसना है या पूनम को दिलासा देना है या अब रात को चूहा पकड़ना है । आखिर में तय हुआ की चलो- बहुत हुई बहादुरी, अब वापस से कमरे में जा कर सोया जाए ।  बिस्तर , तकिया, चादर, ओडोमोस, पानी उठा कर गिरते पड़ते हम फिर कमरे में पहुंचे ।  कमरा खुला था ।  बिना शोर मचाये, बिना रौशनी के हमने अपना बिस्तर फर्श पर लगाया ।  इतने में रागिनी जी उठ गयीं । उन्होने खुद ज़मीन पर आने के लिए कहा और हमें बिस्तर पर- हमने मना  कर दिया । उन्होने कहा की नीचे बहुत मछर होंगे । उन्हे क्या पता था  की मछर तो छोडो , सीधी के “किस” करने वाले चूहों का सामना कर के आ रहे हैं । उन्होने फिर कहा की रौशनी कर के आराम से बिस्तर बिछाइये । हमने रौशनी करने से भी इनकार कर दिया और फटा फट बिस्तर बिछाया और सो गये । सोते सोते पूनम ने फिर हंसा दिया- एक दम से बोल उठी- सपने में कौन था और असल में चूहा निकला।
ऐसी कटी पहली रात- जब सुबह उठ कर बिस्तर लपेटा तो समझ आया की पार्टनरशिप में पार्टनर की बात क्यों माननी चाहिए- अँधेरे मैं जब बिस्तर लगाया था- तो वहीँ एक मरी हुई छिपकली थी जिसको उन्गिनत कीडे खा रहे थे । बिना रौशनी के हमने बिस्तर उसपर ही बिछा  दिया था ! बिस्तर लपेटा तब कीड़ों ने दुबारा हिलना और खाना शुरू किया- उनका डिनर अब ब्रेकफास्ट बन गया था !

मेरे लिए तो सच है – सीधी से कभी मन नहीं भरेगा !

लावण्या मेहरा  सीधी में ४ अक्टूबर से ६ अक्टूबर

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One Response to “सीधी से कभी मन नहीं भरेगा !”

  1. mahendra Says:

    puri baat likhne ke baad kuch man halka ho jayega


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