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Retreat in Parsalli, 4rd October 2013- 6th October 2013 October 24, 2013

Filed under: Uncategorized — paintedpostcards @ 11:20 am

I was dreading this retreat right from the minute it was mentioned. I was not sure what to expect. Going beyond Delhi from your comfort zone is always a concern, but I was excited. All my expectations came true.

The fresh air, healthy food and a gadget free world really distressed me and I realised that this was what i really needed.

As our vehicle took us farther away from Satna into the jungles, in order to protect myself from mosquito bites odomos came as a big help, but then mosquitoes seemed to be small when we heard the driver share stories of bear who maul humans .

For us travelling with my colleagues it was exciting as we were laughing and sharing stories, but then something funny happened- I found myself in a world untouched and pure. In the midst of the tall green trees, thick vegetation, I witnessed a world that glows in the night; I had never seen a sky so thickly populated with stars. Each star looked down upon me and talked amongst themselves and made fun of me every now and then saying, “silly, you don’t know what you have been missing all your life”. I felt special when i was warned against stepping out of the premises unguarded!. I hoped with all my heart to get attacked by a giant bear…will I be courageous enough to fight him or will I be saved by my prince  by my team mates! Not likely…there were more chances of me and my team mates ending up in his stomach.  By the first morning i realised that the unpolluted environment had made me ravenous and I could have eaten  the bear myself.

I made new friends that I always wanted. Beyond projects and teams we have come close. Our whispering in the room, our craziness when we went to the shore of river Son, and our giggling at night talking about the events of the entire day, I have made true  friends who I know will be my strength professionally and personally.   And it has not stopped us from taking moments from our professional  work environments within CHSJ and laugh and share stories.

Friends…this is a blog! And i can’t write stories here.., in fact i not only fell in love with the place, but I became a part of people’s lives whom I met in Parsalli, the villagers in the village that I visited as well as the community activists though passionate about their work also liked  to sing, dance, share, take pride in entertaining their guests, they loved to talk to you and were curious about our lives in the city and what we did, for a change somebody took time to sit with us and share not only their stories but also listened to ours. . I am humbled by their simplicity, honesty and courage to fight for and dream of the much awaited change.

 Would I like to go there again Yes! this is the piece of heaven that i would not mind going again.

Madhulika Masih

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कुछ दिन परसल्ली में और पसरते, साझा विचारों से खूब निखरते ! October 23, 2013

Filed under: Uncategorized — paintedpostcards @ 8:13 am

J Blog1 J Blog2 J Blog3परसली-प्रकृति की छटा बिखेरे व मनोहारी दृश्यों के बीच बसा है। जहां तेंदुआ, साल, महुआ, पलाश व अन्य चौड़ी पत्तीयों के घने जंगल हैं। वहां की शुद्ध हवा, हरे भरे जंगल, कल-कल करती नदी का मन्दम मन्दम शोर सभी  का मन मोह लेती है। नदी किनारे बना प्र्याटक आवास गृह ऐसा लगता है। कि सफेद चादर ओढे जमीन पर चॉद निकल आया हो। और हम सभी से कह रहा हो कि मैं सिर्फ रहने की सुविधा ही नहीं देता हुॅ। बल्कि में रात्रि में रोनाी का काम भी करता हुॅ जिसे आपके हारों में मून लाईट कहा जाता है। मध्य रात्रि 8-9 बजे दिं0 04.10.13 को अचानक कुछ गाड़़ीयों की आवाज के साथ बहुत से लोगों का शोर उस सून सान जगह को व्याकुल करता सा प्रतीत होता है। और सारे पेड़ाें की पत्तीयां आपस में खूसर फुसर करने लगती हैं। कि इतने सारे लोग और कमरे  सिर्फ 04 बहुत कम जगह है। अब क्या होगा? तभी सारे लोग प्रकृति प्रेममयी नजरों से उस सान्त, मनमोहक प्र्याटक आवास गृह को देखने लगते हैं। कुछ साथी बिजली के मन्दम रोनाी में बाहर के दृय भी देखने लगते हैं, कुछ साथीयों को उस प्र्याटक आवास गृह के डिजायन ने अपनी ओर खींच लिया।  कुछ साथीयों को बहती नदी के संगीतमय कल-कल करती आवाज ने अपनी ओर खींच लिया। तभी मुझे लगा कि इस प्राकृतिक छटा ने सभी को आधुनिक सुख सुविधाओं से दूर भूलाकर अपने अनुपम प्राकृतिक सौन्र्दय के मोहपाा में बांध लिया है।
मेरे लिए यह पहला अनुभव था कि मैं सी0एच0एस0जे0 टीम के साथ तीन दिन लगातार रूकने वाला हुॅ। मेरे मन में कई तरह के सवाल पैदा होते थे। कि क्या मैं इन लोगों के सामने अपनी बातों को रख पाउॅगा यां नहीं। इनकी भाषा में भारी भरकम अंग्रेजी होगी जिसे मैं समझ पाउॅगा यां नहीं। इस तरह के कई सवाल थे। जिससे में उलझन में था। मुझे सतना से सुबह ही निकलना था। हम लोग एक गाड़ी में परसली के लिए निकल पड़े। परसली पहुॅचते ही वहां की मनोरम छटा देख कर मुझे अपना गॉव अपने जंगल याद आने लगे। दिन में हम लोगों ने खिचड़ी बनवायी। और बाहर देखा बाहर  हल्की बूॅदा बॉदी हो रही है। जब बारिश बन्द हुई तब हम लोग बाहर घ्ुमाने निकल पड़े। घुमते हुऐ खूब ढेरों बातें हुई। जिसमें मेंने बताया कि भालू से अपनी रक्षा कैसे की जाती है। तब केदार जी ने बताया कि बताओ कैसे रक्षा की जाती है। मेंने कहा जब भालू पीछे पड़े तो भागना नहीं चाहिए। किसी पेड़ की आड़ में रूक जाओ और जब भालू आपको पकड़ने के लिए आये तो आप पेड़ की आड़ ले लो भालू आपको पकड़ने के लिए पेड़ को पकड़ेगा। तो उसके दोनों हाथों को पेड़ से रगड़ दो भालू मर जायेगा। केदार जी ने कहा अभी भालू दिखायी देगा। आप हमें प्रकटिकल करके दिखाओ तो तब मानंगे। फिर मेरी खूब मजाक बनायी।  और फिर केदार जी ने कई गॉवों की कहानीयां भी सुनाई। और कहा भालू से बचाव का एक ही तरीका है। भालू के गर्जन के से पहले खूब शोर करना चाहिए जिससे भालू भाग जाता है।
जब प्र्याटक आवास गृह में वापस आये तो वहां के चौकीदार पंडित जी को मेंने भूतों की कहानीयां सुनाई उनमें मेंने एक कहानी एैसी सुनायी जो जेण्डर धारणा से जुी थी। पंडित जी खुश हो गये। फिर मेंने पंडितों की चालाकी पर एक कहानी सुनाई तो पंडित जी थोडा उखड़ने लगे। ये सब मजाकों का दौर चल रहा था। खैर पंडित जी को मना लिया।
लेकिन जो मन का डर था बना रहा। रात को सारी टीम बैठी और चर्चा की गयी कि हम यहां पर क्या चर्चा करने वाले हैं। अगले दिन का प्लान क्या हैं सारी बातें हुई। इस चर्चा में एक खाा बात यह थी कि ऐसा लग रहा था कि लोग थके होने के बाद भी बड़े जोश व उत्साह से बात कर रहे हैं। धीरे धीरे बड़ा खुनाुमा माहौल बनने लग। मेरा थोड़ा आत्मविवास बनते जा रहा था और मैं लोगों के बीच घुलने मिलने लगा। जो अगेंजी भाषा का खौप मेरे दिमाग में था वह निकलने लगा। रात को खाना खाकर हसीं मजाक व गीत गाते हुऐ सो गये।
सुबह चाय नाता के बाद सारी टीम पुन: बैठी और चर्चा का दौर ाुरू हुआ। मुख्तह: तीन मुद्दों पर चर्चा करायी गयी। इस चर्चा में मेरी कई सारी भ्रान्तियां दूर हुई। और नयी सीख बनी।

•   आधुनिक विकास
•    वंचित समुदाय
•    जेण्डर न्याय
उपर्रोत  मुद्दों पर खूब चर्चा के बाद साझी समझ बनी। सबसे बडी ख़ुशी इस बात पर थी। कि संस्था रिट्रीट के समय पर जहां कार्यकत्र्ता ये मानते हैं। कि कोई भाषण बाजी नहीं होगी सब मस्ती से रहंगे। लेकिन संस्था इस मस्ती भरे माहौल में भी उस वंचित सूदाय के बारे में चिन्तनशील रहती है। वंचितों के मुद्दों पर सवेदनशीलता बनाये रखना ये सब जिस संस्था का मूल्य हो। ये मेरी समझ बनी। यह दिन मेरे लिए उर्जावान दिन के रूप् में हमेशा याद रहेगा।
दिनांक 5.9.2013 का दिन गॉव भ्रमण का रहा। जिसमें साझेदार परियोजना के काम को समुदाय के स्तर पर जानने का एक बेहत्राीन मौका रहा। हम लोग गॉव भ्रमण में टीम के रूप् में बटे थे। हमारी टीम में दादा हमारे साथ थे। गॉव जाते समय उन्होने हमें समूह चर्चा  के लिए एक खाका समझाया। उसी पर बात करने के लिए कहा था। लेकिन गॉव से लौटते वक्त कोई बात नहीं हो पायी। सायद उनकी फीडबैक मिलती तो आगे और हमारी जानकारी बढती। रात्रि में घोरदण्ड सीधी गये। जो कि ऐतिहासिक जानकारी में भी दण्ड देने की जगह के नाम से महाूर है। लेकिन टीम व गॉव के लोगों ने मिलकर उस रात्रि को नाच गानों से आन्नदित कर दिया। खाकार आदिवासी शैला नृत्य ने सबका मन मोह लिया। टीम में कुछ लोगों को छोड़ कर सबने डांस में भागीदारी की। जिन्होंने डांस नहीं किया वो नाम मुझे याद हैं। लेकिन अभी नहीं वक्त आने पर- रिट्रीट

जगदीश लाल

 

सीधी से कभी मन नहीं भरेगा ! October 15, 2013

Filed under: Uncategorized — paintedpostcards @ 4:35 am

सीधी जाने का मन बहुत था । सीधी ऐसी जगह है जिसके बारे में सोच कर ही दिल में ख़ुशी सी होती है. हरे भरे जंगल, पहाड़, संकरे रास्ते, जीप में डोलते हुए सवारी करना और दूर दूर तक कम आबादी- यह सब मुझे बहुत पसंद है । मैं उन लोगों से भी मिलना चाहती थी जिनसे पिछले साल सीधी में जान पहचान हुई थी- उर्मिला जी और उदय भान जी ।
सीधी में बहुत कुछ मिला- छोटी सी दुकानों में ग़जब चाय , समोसे के साथ उनकी ख़ास खट्टाई , गोविन्दगढ़ का वह ढाबा  जहाँ बस बारिश होने ही वाली थी, बसंत राज सिंह के घर वड़ा और छांछ , त्यागी जी के शब्दों में उनके संघर्ष की यात्रा, काठ बंगला, सोन नदी पर बना बाण सागर बाँध , और पूरे समय यात्रा में अन्ताक्षरी खेलना!
एक याद अभी भी चेहरे पर मुस्कान ले आती है । यात्रा से हमें पर्सिली लगभग सुबह दस बजे तक पहुँच जाना चाहिए था । परंपरागत तौर से हम जाकर पहुंचे ठीक दस घंटे देर से- रात आठ बजे । अगर यात्रा की थकान थी भी तो उसे सीधी के नजारों ने मिटा दी थी । सेशन और रात का खाना होने के बाद जब आखिर सोने की बारी आई तब नींद आ नहीं रही थी और सीधी आकर कमरे में बंद होकर सोने का मन भी नहीं कर रहा था । विश्राम घर में कमरे केवल चार थे तो कुछ पुरुष साथियों ने नीचे हॉल में गद्दा लगा लिया था । श्रीति, मैं और पूनम भी वहीँ पहुँच गए । एक बढ़िया सी जगह मिल गयी और वही तीन गद्दे  डाल  दिए और चद्दर लपेट कर सोने का प्रयास करने लगे । गद्दे अजीब थे, रुई बीच बीच में इकठ्ठा हो गयी थी तो लग रहा था की गद्दों में कंचे डाले हुए हैं । अब नींद नहीं आ रही थी । बहुत कुछ था आपस में बात करने के लिए। लगभग एक- डेढ़ घंटे तक अँधेरे में लेटे लेटे  हम लोग धीरे धीरे बात करते हुए हंस रहे थे । इतनी देर तक और इतनी जोर से  हसने का नतीजा यह हुआ की पुरुष भी उठ गये ।  उन्हे लगा की हसने में तो हरा नहीं सकते तो इन तीन कववो जैसी आवाज वाली लड़कियों को गाने में ही पछाड देते  हैं । उनका अनुमान सही था । उस तरफ  एक से एक बढ़कर  गाने वाले थे तो रात के एक डेढ़ बजे से अलग अलग प्रदेशों के गीत चले ।  कभी केदार जी, कभी त्यागी जी, कभी जगदीश जी, कभी अजय भी । बस मन कर रहा था की रात ऐसे ही बीत जाये – कुछ हसी में और कुछ गानों में । फिर दो बजे तक सब शांत होने लगे तो अब लड़कियों ने विचार किया की या तो सो ही जायें या नदी तक चलते हैं । नदी का प्लान बन रहा था की एक बड़ा सा जानवर हमें कांच के दरवाज़े के बाहर दिखा । होना तो कुत्ता ही थी पर आंखे एक टुक कर के देख रहा था तो हमें लगा की कुछ और न हो- जैसे सिआर। इतनी में श्रीति चिल्लाई की सिआर है- लेकिन घबराहट में उसके मुह से सिआर के बजाये निकला – सियर , सियर ! इसपर हमें और हसी आ गयि । डर भी था पर हंसने से फुर्सत भी नहीं थी ।  वह जो भी था थोड़ी देर में हमसे ऊब कर वहीँ लेट कर सो गया । हमने भी दोबारा सोने का प्रयास किया । अब तो पूरे हॉल में हम ही तीन जागे हुए थे । फिर आंखे बंद हुई और जैसे ही नींद आने लगी- पूनम चिल्ला उठी । उफ़ अब क्या ?।  पूनम ने बताया की चूहा है । हमने कहा की ज़रूर होगा पर अब चला गया तो अब सो जाओ ।  पूनम ने कहा की नहीं, बात यह है की चूहा उसकी बाजू पर “किस” कर के गया है !  एक तो वैसे ही चौबीस घंटे से ज्यादा यात्रा कर के आये थे, ढंग से सोये भी नहीं थे, नयी जगह भी थी, थके हुए भी थे, अन्ताक्षरी गा गा  के गला पक  गया था, मछर काट रहे थे, ओडोमोस की सुगंध से सर भारी हो रहा था– ऊपर से पूनम का यह दावा की चूहा उसे “किस” कर के गया है । अब यह तो ज्यादा हो रहा था । तीन चार मिनट तो सोचने में लग गए की हँसना है या पूनम को दिलासा देना है या अब रात को चूहा पकड़ना है । आखिर में तय हुआ की चलो- बहुत हुई बहादुरी, अब वापस से कमरे में जा कर सोया जाए ।  बिस्तर , तकिया, चादर, ओडोमोस, पानी उठा कर गिरते पड़ते हम फिर कमरे में पहुंचे ।  कमरा खुला था ।  बिना शोर मचाये, बिना रौशनी के हमने अपना बिस्तर फर्श पर लगाया ।  इतने में रागिनी जी उठ गयीं । उन्होने खुद ज़मीन पर आने के लिए कहा और हमें बिस्तर पर- हमने मना  कर दिया । उन्होने कहा की नीचे बहुत मछर होंगे । उन्हे क्या पता था  की मछर तो छोडो , सीधी के “किस” करने वाले चूहों का सामना कर के आ रहे हैं । उन्होने फिर कहा की रौशनी कर के आराम से बिस्तर बिछाइये । हमने रौशनी करने से भी इनकार कर दिया और फटा फट बिस्तर बिछाया और सो गये । सोते सोते पूनम ने फिर हंसा दिया- एक दम से बोल उठी- सपने में कौन था और असल में चूहा निकला।
ऐसी कटी पहली रात- जब सुबह उठ कर बिस्तर लपेटा तो समझ आया की पार्टनरशिप में पार्टनर की बात क्यों माननी चाहिए- अँधेरे मैं जब बिस्तर लगाया था- तो वहीँ एक मरी हुई छिपकली थी जिसको उन्गिनत कीडे खा रहे थे । बिना रौशनी के हमने बिस्तर उसपर ही बिछा  दिया था ! बिस्तर लपेटा तब कीड़ों ने दुबारा हिलना और खाना शुरू किया- उनका डिनर अब ब्रेकफास्ट बन गया था !

मेरे लिए तो सच है – सीधी से कभी मन नहीं भरेगा !

लावण्या मेहरा  सीधी में ४ अक्टूबर से ६ अक्टूबर