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यात्राओं के दौरान अजीबो-गरीब स्तिथि April 6, 2013

Filed under: Uncategorized — paintedpostcards @ 11:47 pm

26 मार्च को मैं अपनी पत्नी, बेटी और बेटे के साथ इलाहाबाद से अतर्रा के लिए सुबह 6:00 इलाहाबाद स्टेशन पर पहुंचा। हमें टेन में बैठाने के लिए छोटा भाई भी स्टेशन पर आया था। होली का पर्व होने के कारण बहुत ही भीड थी। ज्यों ही प्लेटफार्म में टेन लगी मैं परिवार के सभी लोगों को इन्तजार करके बर्थ लेने के लिए कोच में चढ़ गया और दो बर्थ ले लिया। तभी एक युवक भी पीछे से चढ़ा और हमारा बैग हटाकर अपना सामान रख दिया। इस पर मैनें कहा कि यहां पर दो लोग हैं तो वह अकड कर बोला मेरा सामान पहले से रखा है। मैन उसका बैग खिसकार बगल में अपना बैग भी रख दिया। इससे वह बहुत की क्राेधित हो गया और मॉ-बहन की गाली-गलौज करने लगा। मैं चुपचाप सुनता रहा और इतनी देर में मेरा छोटा भाई वहीं पर खड़े होकर सुनता रहा तथा पत्नी और बच्चें बर्थ में आकर बैठ गये और मैं खड़ा हो गया। देखा कि वह युवक जिसके साथ एक और लड़का तथा दो महिलाएं और भी थी शांत होने का नाम नही ले रहा था तथा गाली देता ही जा रहा था। इस पर छोटे भाई ने उसके गाल में दो तमाचा जड़ दिया जिस दूसरे लोग भी बीच-बचाव में आ गये। उसके साथ में दूसरा लड़का तथा महिलाएं भी चिल्लाने लगी लेकिन वह सीधे मुझे ही निशाना बनाये जा रहा था तथा गाली गलौज करते हुए मारने के लिए पैर चलाने लगा। उसके साथ जो दूसरा लड़का था वह भी दूर से चिल्लाने और मुझे ही उल्टा सीधा बोलने लगा। मैं भी चिन्ता में पड़ गया कि आखिरकार मैने अभी मारा भी जबकि छोटे भाई ने दो थप्पड मारा भी है और लगातार मुझे ही निशाना बनाये जा रहे हैं। वह बार-बार मेरी तरफ बढ़ रहा था लेकिन छोटा भाई उसे पकड़े हुए था लेकिन बीच-बीच में पैर चलाये जा रहा था। मेरा भी गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था और उसके पैर मारने पर मैने भी पैर से मारने का प्रयास किया लेकिन लोगों की भीड जमा होने के कारण पैर उसके पास तक पहुंच ही नही पाया। वह लगातार देख लेने की धमकी देता रहा और खैर विवाद आगे न बढ़े इसके लिए हम सभी लोग उस कोच से उतरकर आगे के दूसरे कोंच में बैठ गये।
छोटा भाई हम लोगों को बैठा कर वापस घर चला गया और फोन पर बीच-बीच में हालचाल लेता रहा तथा उसने अतर्रा भी दो लोगों को फोन कर घटना के बारे में बता दिया जिससे वे भी बीच-बीच में कोई दिक्कत तो नही है, ऐसा पूछते रहे जिस पर हमने हर बार कोई दिक्कत न होने तथा स्टेशन न आने के लिए उन्हे कहते रहे। फिर भी एक रिश्तेदार स्टेशन आ ही गये। दोपहर सवा दो बजे जैसे ही हम लोग अतर्रा स्टेशन पर उतरे अचानक 4-5 लोगों ने हम लोगों को घेर लिया तथा उन लड़को के साथ जो महिला थी उसने पहचनवाया कि इन महिलाओं के साथ हैं। इसी बीच हमने जल्दी से इलाहाबाद भाई को फोन कर कुछ लोगों को स्टेशन भेजने व अतर्रा अपने भाई को फोन कर तुरन्त स्टेशन आने के लिए कहा। इस दौरान वह सभी लोग मेरे पर हाथ और पैर से हमला कर दिये मैं दीवार से टकराकर जमीन पर गिरा और नाक से खून भी बहने लगा, वे पैर से भी मारते रहे। भीड तमाशा देखती रही और पत्नी तथा मेरी बहन जो रास्ते में साथ में आ गई थी वे हमला करने वालो को खीचते रही और पानी की खाली बोतल से उन्हे मारती भी रही। बेटी घबरा गई और वह भी जोर-जोर से रोती रही। थोडी देर बाद वे सभी लोग वहां से चले गये। उनके चले जाने के बाद एक बन्दूक लिए हुए आदमी ने कहा पकड़ कर लाओं सालो को, देखते हैं कौन है, इस पर मैं उसकी बातसुनकर चुप रह गया। इसके बाद पत्नी, बच्चों व बहन को रिक्शा लेकर घर जाने के लिए कहा और वे लोग घर चले गये।
वे करीब 500 मी0 दूर ही पहुंचे होगें कि मेरा भाई 3-4 लोगों को लेकर आ गया तथा 2-3 लोग पीछे और आ रहे थे। सबसे पहले मैं और मेरा भाई दोनो उन लोगों के आगे पहुंचकर बाईक रोकी और उन्हें रूकने के लिए कहते हुए मारपीट का कारण पूछने लगे लेकिन उन्होने सोचा कि ये दो ही लोग हैं और रूकने की बजाय पुन्: मारपीट शुरू कर दिये जिस पर बड़े भाई को भी हल्की चोट आई इसी बीच भाई के साथ आये बाकी लोग भी आ गये और मारने वाले लोगों को पकड-पकड़ कर पीटने लगे। उन लोगों को भी चोट लगी और एक लड़के के चेहरे से खून बहने लगा। जब उन्हें लगा कि अब हम कम लोग हैं तथा मार खा रहे हैं तो उन लड़कों में एक सफाई देने लगे कि मैं बीच-बचाव कर रहा था, दूसरा बोलने लगा कि अच्छा मार लो जितना मारना है मैं खड़ा हूँ, बाकी दो चुपचाप खड़े रहे। इसी बीच छोटे भाई ने पुलिस को भी स्टेशन के पास आने के लिए सूचना दे दी लेकिन पुलिस के आने के पूर्व उन चारो लड़कों को मना करने के बावजूद बीच-बीच में छोटा भाई मारता रहा और वे चुप रह जाते। मैं छोटे भाई को पकडकर कर दूर करता रहा। विवाद आगे न बढ़े यह सोचकर अन्त में बड़े भाई के दोस्त ने उन चारों लड़कों को दुबारा दिखाई देने पर मार खाने की धमकी देते हुए यहां से चले जाने को कह दिया और वे चुपचाप चले गये।
जब हम लोग लौटने लगे तो पुलिस का फोन आया कि आप लोग कहा है तो उसे उन लड़को के भाग जाने तथा हम लोगों के वापस अपने घर आने की बात कहकर स्टेशन न आने को कहा। छोटे भाई ने इलाहाबाद से पुलिस को पुन: फोन किया जिस पर शाम को पुलिस ने दुबारा फोन कर घटना के बारे में पूछा। यह बात परिवार के काफी लोगों को पता चल गई थी और उनमें से कुछ लोग पुन्: उन लड़कों का पता लगाने के लिए बगैर मेरी जानकारी के जिधर वे गये थे बाईक लेकर पता लगाने निकल गये। इस बात का पता जब हमारे चाचा जी को लगा तो उन्होंने फोन कर उन्हे फौरन वापस घर आने के लिए कहा।
मेरे घर पहुंचने के बाद पत्नी बार-बार समझाने लगी दुबारा कभी झगड़ा न करना, इतने साल हो गये कभी किसी से झगड़ा नही किया, पता नही आज क्या हो गया। उन लडकों को गाली भी दे रही थी, पहले तो मैं चुपचाप बैठकर सुनता रहा फिर मैने कहा कि गाली क्यों दे रही हो वे भी तो किसी के भाई, बेटे हैं जिस पर वे मुस्करा दी तथा थोडी देर बाद मैं उठकर वहां से चला गया। इसके बाद परिवार के कई लोगों को मुझे जवाब देना पड़ा कि झगड़ा कैसे हुआ। भाभी बहुत गुस्से में थी और उन्होंने कहा कि मैं भाई के दोस्त से पूछूगीं कि उन्हे कैसे जाने दिया वे रिश्तेदार थे क्या। जैसे-जैसे समय बीतता गया वैसे-वैसे सभी का गुस्सा कम होता गया। दूसरे दिन मैं पत्नी और बच्चों को लेकर गांव चला गया। मॉ और पिता जी को तो विश्वास ही नही हो रहा था कि मै किसी से झगड़ा कर सकता हूँ, वे पत्नी से कह रही थी कि करीब 15 साल से आज तक उन्होंने मुझे किसी से झगड़ा करते हुए देखा ही नही है और मुझसे हालचाल पूछती रही तथा पिताजी इस बारे में कुछ बोले ही नही। मुझे भी नही पता था कि घर वाले मेरे बारे में ऐसी राय रखते हैं, इसके बाद तो अब कहीं भी निकलो घर से किसी न किसी का हालचाल पूछने के लिए लगातार फोन बज रहा है।
2 अप्रैल को जब यह बात जब मैने अपने आँफिस के एक साथी को फोन पर बताया और उन्होने दूसरे लोगों को बताया तो उनके दिमाग में यही आया कि कहीं अप्रैल फूल तो नही मना रहे। खैर शाम होते-होते फिर से फोन आया और उन्हे स्पष्ट किया कि यह घटना सच है।
धीरे-धीरे मैं भी उस घटना से बाहर निकलने का प्रयास करता रहा लेकिन कमर के पर हड्डी में कुछ ज्यादा ही चोट लग जाने के कारण लगातार दर्द और रात में एक ही करवट में सोना पड़ रहा है, जिसके बारे में मैने घर में किसी को बताया ही नही है, मुझे लगता है कि अगर मैं इस बात को घर में बता देता तो शायद घर के लोग ज्यादा ही परेशान होते तथा फोन और ज्यादा आते। बाकी सब ठीक है। यात्राओं के दौरान इस तरह की अजीबो-गरीब स्तिथि कई बार दूसरे के साथ भी देखना पड़ता है ऐसी – स्तिथि में कभी-कभी समझ में ही नही आता कि क्या किया जाय। आपके सुझाव पुरूषों के साथ काम करने व स्वबदलाव की दिशा में मददगार हो सकते हैं, इसलिए आपके सुझावों का स्वागत है।

By Mahendra Kumar, in Allahabad in March 2013

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