paintedpostcards

A topnotch WordPress.com site

“This is how it should be” April 19, 2013

Filed under: Uncategorized — paintedpostcards @ 5:51 am

For me while growing up I never questioned why it was my mother who had to cook and clean the house after returning back from her hospital duty (both my parents were doctors in the same medical college) and my father had to take rest after a hard day’s work.  I never questioned my father’s anger when my mother’s sindur (at that time sticker bindi’s were not very popular) melted of in her sweat and my father’s friends jokingly pointed it out to my father.   I remember the fight in my parent’s room, and my mother’s tear stained face scratched and her glass bangles broken.  After that incident my mother swore off sindur and glass bangles and despite my father’s pressure and taunts she never wore it.  Today sitting in a room full of people fighting against patriarchy and masculinity through the Samajhdar Jodidar Project of UNFPA, those childhood memories flooded back.  I also grew up in a similar environment and I think most of us, may be all of us grew up in an environment where a women’s dignity was measured by what she wore, who she talked to, how she behaved and how submissive she was.

The Samajhdar Jodidar project touched that raw wound that I had been carrying since my childhood.  Here I was sitting in a roomful of men, women, young women and young men who are struggling and fighting the same fight that my mother fought so many years ago.   The stories shared by them are not very different.  Neeta one of the facilitators of the project spoke of how during the One Billion Rising event young boys shared stories of how they eve teased and sexually harassed young girls in the adjoining villages, any particular reason for doing it, not really; everybody else had done it.  Was it wrong? Now they think probably it was wrong, but when they did it back then they did not think there was anything wrong in doing it.  Women abused and beaten up by the husband because she talked with a male member in her village.  Was it wrong, the husband felt at that time that it was wrong of his wife and this was pointed out by the women members in the family too; so there was a need to control the wife’s “promiscuous” behaviour.  You can keep questioning this and keep asking yourself why, but then the answer is the same; women have been the easiest to dominate, and this domination starts from within the home and family.  I love the fact that Samajhdar Jodidar Project has found the right place to start their work and that is within the family where girls learn to be their mothers and boys learn to be their fathers; where girls learn to be submissive and docile and tolerate pain and humiliation and boys learn to be perpetrators of violence; where men believe that violence is their birthright and where women believe that men have the right to do what they want.

I also loved hearing the story of change; a father repenting for abusing and physically beating his five daughters and wanting to change his behaviour so that they remembered a father who cared and loved them.   A husband willingly sharing household chores with his wife as he believes that he equally is responsible for household work.  A boy of 17 standing up against eve teasing and sexual harassment believing that it was wrong and below the dignity of a woman to be harassed just because she is a girl.   A young man for the first time taking his wife on his motor bike, not caring what neighbours said.  These stories inspire you and you want to hear more of these stories, this is how it should be.   I love the work that I am doing through this project and I love the voices that I hear now….. It is inspiring!

 

Sarita Barpanda

 

यात्राओं के दौरान अजीबो-गरीब स्तिथि April 6, 2013

Filed under: Uncategorized — paintedpostcards @ 11:47 pm

26 मार्च को मैं अपनी पत्नी, बेटी और बेटे के साथ इलाहाबाद से अतर्रा के लिए सुबह 6:00 इलाहाबाद स्टेशन पर पहुंचा। हमें टेन में बैठाने के लिए छोटा भाई भी स्टेशन पर आया था। होली का पर्व होने के कारण बहुत ही भीड थी। ज्यों ही प्लेटफार्म में टेन लगी मैं परिवार के सभी लोगों को इन्तजार करके बर्थ लेने के लिए कोच में चढ़ गया और दो बर्थ ले लिया। तभी एक युवक भी पीछे से चढ़ा और हमारा बैग हटाकर अपना सामान रख दिया। इस पर मैनें कहा कि यहां पर दो लोग हैं तो वह अकड कर बोला मेरा सामान पहले से रखा है। मैन उसका बैग खिसकार बगल में अपना बैग भी रख दिया। इससे वह बहुत की क्राेधित हो गया और मॉ-बहन की गाली-गलौज करने लगा। मैं चुपचाप सुनता रहा और इतनी देर में मेरा छोटा भाई वहीं पर खड़े होकर सुनता रहा तथा पत्नी और बच्चें बर्थ में आकर बैठ गये और मैं खड़ा हो गया। देखा कि वह युवक जिसके साथ एक और लड़का तथा दो महिलाएं और भी थी शांत होने का नाम नही ले रहा था तथा गाली देता ही जा रहा था। इस पर छोटे भाई ने उसके गाल में दो तमाचा जड़ दिया जिस दूसरे लोग भी बीच-बचाव में आ गये। उसके साथ में दूसरा लड़का तथा महिलाएं भी चिल्लाने लगी लेकिन वह सीधे मुझे ही निशाना बनाये जा रहा था तथा गाली गलौज करते हुए मारने के लिए पैर चलाने लगा। उसके साथ जो दूसरा लड़का था वह भी दूर से चिल्लाने और मुझे ही उल्टा सीधा बोलने लगा। मैं भी चिन्ता में पड़ गया कि आखिरकार मैने अभी मारा भी जबकि छोटे भाई ने दो थप्पड मारा भी है और लगातार मुझे ही निशाना बनाये जा रहे हैं। वह बार-बार मेरी तरफ बढ़ रहा था लेकिन छोटा भाई उसे पकड़े हुए था लेकिन बीच-बीच में पैर चलाये जा रहा था। मेरा भी गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था और उसके पैर मारने पर मैने भी पैर से मारने का प्रयास किया लेकिन लोगों की भीड जमा होने के कारण पैर उसके पास तक पहुंच ही नही पाया। वह लगातार देख लेने की धमकी देता रहा और खैर विवाद आगे न बढ़े इसके लिए हम सभी लोग उस कोच से उतरकर आगे के दूसरे कोंच में बैठ गये।
छोटा भाई हम लोगों को बैठा कर वापस घर चला गया और फोन पर बीच-बीच में हालचाल लेता रहा तथा उसने अतर्रा भी दो लोगों को फोन कर घटना के बारे में बता दिया जिससे वे भी बीच-बीच में कोई दिक्कत तो नही है, ऐसा पूछते रहे जिस पर हमने हर बार कोई दिक्कत न होने तथा स्टेशन न आने के लिए उन्हे कहते रहे। फिर भी एक रिश्तेदार स्टेशन आ ही गये। दोपहर सवा दो बजे जैसे ही हम लोग अतर्रा स्टेशन पर उतरे अचानक 4-5 लोगों ने हम लोगों को घेर लिया तथा उन लड़को के साथ जो महिला थी उसने पहचनवाया कि इन महिलाओं के साथ हैं। इसी बीच हमने जल्दी से इलाहाबाद भाई को फोन कर कुछ लोगों को स्टेशन भेजने व अतर्रा अपने भाई को फोन कर तुरन्त स्टेशन आने के लिए कहा। इस दौरान वह सभी लोग मेरे पर हाथ और पैर से हमला कर दिये मैं दीवार से टकराकर जमीन पर गिरा और नाक से खून भी बहने लगा, वे पैर से भी मारते रहे। भीड तमाशा देखती रही और पत्नी तथा मेरी बहन जो रास्ते में साथ में आ गई थी वे हमला करने वालो को खीचते रही और पानी की खाली बोतल से उन्हे मारती भी रही। बेटी घबरा गई और वह भी जोर-जोर से रोती रही। थोडी देर बाद वे सभी लोग वहां से चले गये। उनके चले जाने के बाद एक बन्दूक लिए हुए आदमी ने कहा पकड़ कर लाओं सालो को, देखते हैं कौन है, इस पर मैं उसकी बातसुनकर चुप रह गया। इसके बाद पत्नी, बच्चों व बहन को रिक्शा लेकर घर जाने के लिए कहा और वे लोग घर चले गये।
वे करीब 500 मी0 दूर ही पहुंचे होगें कि मेरा भाई 3-4 लोगों को लेकर आ गया तथा 2-3 लोग पीछे और आ रहे थे। सबसे पहले मैं और मेरा भाई दोनो उन लोगों के आगे पहुंचकर बाईक रोकी और उन्हें रूकने के लिए कहते हुए मारपीट का कारण पूछने लगे लेकिन उन्होने सोचा कि ये दो ही लोग हैं और रूकने की बजाय पुन्: मारपीट शुरू कर दिये जिस पर बड़े भाई को भी हल्की चोट आई इसी बीच भाई के साथ आये बाकी लोग भी आ गये और मारने वाले लोगों को पकड-पकड़ कर पीटने लगे। उन लोगों को भी चोट लगी और एक लड़के के चेहरे से खून बहने लगा। जब उन्हें लगा कि अब हम कम लोग हैं तथा मार खा रहे हैं तो उन लड़कों में एक सफाई देने लगे कि मैं बीच-बचाव कर रहा था, दूसरा बोलने लगा कि अच्छा मार लो जितना मारना है मैं खड़ा हूँ, बाकी दो चुपचाप खड़े रहे। इसी बीच छोटे भाई ने पुलिस को भी स्टेशन के पास आने के लिए सूचना दे दी लेकिन पुलिस के आने के पूर्व उन चारो लड़कों को मना करने के बावजूद बीच-बीच में छोटा भाई मारता रहा और वे चुप रह जाते। मैं छोटे भाई को पकडकर कर दूर करता रहा। विवाद आगे न बढ़े यह सोचकर अन्त में बड़े भाई के दोस्त ने उन चारों लड़कों को दुबारा दिखाई देने पर मार खाने की धमकी देते हुए यहां से चले जाने को कह दिया और वे चुपचाप चले गये।
जब हम लोग लौटने लगे तो पुलिस का फोन आया कि आप लोग कहा है तो उसे उन लड़को के भाग जाने तथा हम लोगों के वापस अपने घर आने की बात कहकर स्टेशन न आने को कहा। छोटे भाई ने इलाहाबाद से पुलिस को पुन: फोन किया जिस पर शाम को पुलिस ने दुबारा फोन कर घटना के बारे में पूछा। यह बात परिवार के काफी लोगों को पता चल गई थी और उनमें से कुछ लोग पुन्: उन लड़कों का पता लगाने के लिए बगैर मेरी जानकारी के जिधर वे गये थे बाईक लेकर पता लगाने निकल गये। इस बात का पता जब हमारे चाचा जी को लगा तो उन्होंने फोन कर उन्हे फौरन वापस घर आने के लिए कहा।
मेरे घर पहुंचने के बाद पत्नी बार-बार समझाने लगी दुबारा कभी झगड़ा न करना, इतने साल हो गये कभी किसी से झगड़ा नही किया, पता नही आज क्या हो गया। उन लडकों को गाली भी दे रही थी, पहले तो मैं चुपचाप बैठकर सुनता रहा फिर मैने कहा कि गाली क्यों दे रही हो वे भी तो किसी के भाई, बेटे हैं जिस पर वे मुस्करा दी तथा थोडी देर बाद मैं उठकर वहां से चला गया। इसके बाद परिवार के कई लोगों को मुझे जवाब देना पड़ा कि झगड़ा कैसे हुआ। भाभी बहुत गुस्से में थी और उन्होंने कहा कि मैं भाई के दोस्त से पूछूगीं कि उन्हे कैसे जाने दिया वे रिश्तेदार थे क्या। जैसे-जैसे समय बीतता गया वैसे-वैसे सभी का गुस्सा कम होता गया। दूसरे दिन मैं पत्नी और बच्चों को लेकर गांव चला गया। मॉ और पिता जी को तो विश्वास ही नही हो रहा था कि मै किसी से झगड़ा कर सकता हूँ, वे पत्नी से कह रही थी कि करीब 15 साल से आज तक उन्होंने मुझे किसी से झगड़ा करते हुए देखा ही नही है और मुझसे हालचाल पूछती रही तथा पिताजी इस बारे में कुछ बोले ही नही। मुझे भी नही पता था कि घर वाले मेरे बारे में ऐसी राय रखते हैं, इसके बाद तो अब कहीं भी निकलो घर से किसी न किसी का हालचाल पूछने के लिए लगातार फोन बज रहा है।
2 अप्रैल को जब यह बात जब मैने अपने आँफिस के एक साथी को फोन पर बताया और उन्होने दूसरे लोगों को बताया तो उनके दिमाग में यही आया कि कहीं अप्रैल फूल तो नही मना रहे। खैर शाम होते-होते फिर से फोन आया और उन्हे स्पष्ट किया कि यह घटना सच है।
धीरे-धीरे मैं भी उस घटना से बाहर निकलने का प्रयास करता रहा लेकिन कमर के पर हड्डी में कुछ ज्यादा ही चोट लग जाने के कारण लगातार दर्द और रात में एक ही करवट में सोना पड़ रहा है, जिसके बारे में मैने घर में किसी को बताया ही नही है, मुझे लगता है कि अगर मैं इस बात को घर में बता देता तो शायद घर के लोग ज्यादा ही परेशान होते तथा फोन और ज्यादा आते। बाकी सब ठीक है। यात्राओं के दौरान इस तरह की अजीबो-गरीब स्तिथि कई बार दूसरे के साथ भी देखना पड़ता है ऐसी – स्तिथि में कभी-कभी समझ में ही नही आता कि क्या किया जाय। आपके सुझाव पुरूषों के साथ काम करने व स्वबदलाव की दिशा में मददगार हो सकते हैं, इसलिए आपके सुझावों का स्वागत है।

By Mahendra Kumar, in Allahabad in March 2013

 

New World is Possible April 2, 2013

Filed under: Uncategorized — paintedpostcards @ 2:10 am

I had a chance to visit Savitri Bai Phule Mahila Mandal (SPMM) and its field during 17-18th March. This was my 2nd visit to SPMM. The 1st was in June 2010 when there was partners’ selection process for Samajdar Jodidar project. At that time I was not able to visit SPMMs field area.

My journey started in huge stress. I had to go for partnership assessment which was not a very pleasant task. There was a lot of preparation needed. I was a little tense. I got up early morning at 3am and my flight was at 6.25am. I had to report to the airport at 5.25 am. I planned to take a taxi at 4.45am. I needed 45 minutes to prepare myself but due to my tension, I miscalculated and got ready at 3.45am. Later I realised that my calculation was wrong and I was ready 45 minutes before time. At that time I was unable to do anything besides waiting for the taxi. I did not get call from the taxi service till 4.35am. I again called the taxi booking services and got a reply that my taxi was booked for 18th rather than 17th morning. Anyway the taxi company immediately arranged for the taxi.

My flight was on time and I landed in Aurangabad before the scheduled time. I reached SPMM office by 11am and immediately my meeting started with the head of the organisation, Facilitator and later, a meeting was held with the Animators. The organisation and its staff took this meeting very seriously.

The first opportunity to visit the villages of Beed came during the last evening when we were in the villages till nearly mid night. I visited 3 villages between 7.00-8.00pm, 8.30-9.30pm and the last meeting between 10.00-11.30pm. All these meetings went off very well. There were 10-25 group members present in each meeting. I was very impressed to hear of what the group members are doing and why they are taking these steps. Group members were very happy to meet us and share their changes and challenges.

I felt touched when a young member of the group shared that earlier his father was committing violence against his mother, which now had stopped after his intervention with the support of other peers. Group members spoke about their role in sharing responsibility of contraceptive use as well. Group members were reacting for ending early marriage, sexual harassment and eve teasing in public spaces.

I found that these changes and the crisis faced by members while challenging gender stereotypes and patriarchy have brought them closer. My best wishes to all these members who are involved in challenging patriarchy and contributing towards the making of a gender just society. Their efforts and commitment show that a ‘new world is possible.’

By Satish Kumar Singh, in Maharashtra during 17-18th March 2013